जिले की फैक्टरियों के दूषित पानी को एसटीपी में ट्रीट करने को लेकर आईआईटी की टीम करेगी रिसर्च
जगाधरी और यमुनानगर की इंडस्ट्री से निकलने वाले तेजाबी, मेटल युक्त और जहरीले पानी पर आईआईटी रुड़की की टीम रिसर्च करेगी। रिसर्च में यह पता लगाया जाएगा कि फैक्टरियों के दूषित पानी को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जा सकता है या नहीं। शुक्रवार को रुड़की से टीम को आना था। टीम शहर में कई जगह से फैक्टरी से निकलने वाले गंदे पानी के सैंपल लेगी। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि सीईटीपी की प्लानिंग सिरे चढ़ती नहीं दिख रही है। इसलिए सरकार चाहती है कि जो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं उन्हीं में फैक्टरियों से निकलने वाले पानी को ट्रीट किया जा सके।
हालांकि बीओडी ज्यादा होने से सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में उसे ट्रीट करना मुश्किल काम है। ज्यादा बीओडी को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का सिस्टम सह नहीं पाता और वह पानी को ट्रीट नहीं कर पाएगा। सीईटीपी लगाने के लिए 30 से 40 करोड़ रुपए का खर्च बताया जाता है। वहीं सबसे बड़ी दिक्कत अव्यवस्थित तरीके से शहर में लगी फैक्टरियों से गंदा पानी एकत्रित करना है। वहीं कई बार यह बात सामने आ चुकी है कि यमुना नहर और नदी यमुनानगर से ही दूषित होना शुरू हो जाती है। जोकि दिल्ली तक पहुंचते-पहुंचते पूरी तरह से दूषित हो जाती है।
वीरवार को जब केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रतनलाल कटारिया ने यमुना नहर और नदी का दौरा किया था तो तब भी यह बात सामने आई थी कि यमुना नदी और नहर में गंदे पानी के नाले गिर रहे हैं। उधर, व्यापारियों का कहना है कि वे भी चाहते हैं कि सरकार सीईटीपी जल्द से जल्द लगाए या फिर कोई और रास्ता निकाले ताकि पानी ट्रीट होकर आगे जाए ।
18 एमएलडी पानी हर दिन निकलता है इंडस्ट्री से
प्रदूषण नियंत्रण विभाग के अनुसार यमुनानगर और जगाधरी की फैक्टरियों से 18 एमएलडी पानी निकलता है जोकि सीवरेज या फिर नालों से होते हुए यमुना नहर में ही जाता है। हालांकि कहने को तो कई बड़े फैक्टरियों में ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं, लेकिन कहा जाता है कि फैक्टरी मालिक उन्हें नहीं चलाते। क्योंकि उन्हें चलाने का खर्च लाखों में है। इसलिए जब प्रदूषण विभाग की टीम सैंपल लेने आती है तो उन्हें बता दिया जाता है ताकि रिपोर्ट यह आए कि बाहर पानी ट्रीट होकर आ रहा है। बताते हैं कि जगाधरी की मेटल फैक्टरियों से निकलने वाले पानी में तेजाब, मेटल समेत अन्य केमिकल मिक्स होते हैं ।
बीओडी कम हुआ तो डोमेस्टिक ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट होगा पानी
फैक्टरियों से निकलने वाले पानी में अगर बीओडी अगर कम हुई तो उसे सीवरेज सीवरेज ट्रीटमेंट में ट्रीट किया जा सकता है। वहीं इसके साथ ही दूसरा प्लान है कि अगर बीओडी ज्यादा हो तो इसके लिए सीईटीपी लगाया जाएगा। दो सीईटीपी की प्लानिंग है। एक दस और दूसरा 20 एमएलडी का होगा। इसके साथ ही जो रूड़की आईआईटी के एक्सपर्ट आएंगे वे किसी और तकनीक से बीओडी कम करने पर भी विचार करेंगे ताकि बीओडी कुछ कम कर उस पानी को सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में ही ट्रीट किया जा सके। दाे सीईटीपी लगाने का मतलब करोड़ों रुपए का खर्च है ।
उद्योगपति प्राइवेट पार्टनरशिप पर सीईटीपी लगाने की कर रहे तैयारी
कई दशकों से जगाधरी में फैक्टरियों के लिए सीईटीपी (कॉमन इंफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट) लगाने की प्लानिंग चल रही है। लेकिन यह आज तक सिरे नहीं चढ़ी। एनजीटी कई बार इसे लेकर सरकार को डांट लगा चुका है। जब शहर से इंडस्ट्री बाहर निकालने की बात आई तो सीईटीपी लगाने की प्लानिंग पर काम होने लगा। सरकार ने फैक्टरी मालिकों ने लुधियाना की एक कंपनी से एमओयू साइन किया था।
इसमें यहां पर प्राइवेट पार्टनशिप पर प्लांट लगाना था। इस पर काम चल रहा है, लेकिन यह अभी सिरे नहीं चढ़ा है। तब व्यापारी एसोसिएशन की ओर से कहा गया था कि जगाधरी में 700 मेटल इंडस्ट्री है। सीईटीपी इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी को ट्रीट करेगा। प्लांट की क्षमता तीन लाख लीटर प्रति ट्रीट करने की होगी। जगाधरी की फैक्ट्रियों से हर दिन 70 हजार से एक लाख लीटर तक पानी डिस्चार्ज होता है। टैंकर से गंदा पानी फैक्टरियों से एकत्रित किया जाएगा और फिर उसे प्लांट तक ले जाया जाएगा ।
रिसर्च के बाद क्लियर होगा कि पानी को कैसे और कहां ट्रीट करेंगे : कटारिया
केंद्रीय शक्ति व सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रतनलाल कटारिया ने बताया कि अधिकारियों ने उन्हें जानकारी दी है कि फैक्टरियों से निकलने वाले पानी को आईआईटी रूड़की की टीम जांच करेगी। उसमें वह जांचेगी कि इस पानी में बीओडी कितना है और इसे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जा सकता है या नहीं। उनका कहना है उनका प्रयास है कि यमुना नदी और नहर पूरी तरह से स्वच्छ रहे। उसमें एक बूंद भी गंदे पानी की न जाए।
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